पीएमटी-2012 केस के आरोपियों की अग्रिम जमानत पर दो घंटे सुनवाई, फैसला सुरक्षित

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भोपाल.पीएमटी-2012 मामले में आरोपी चिरायु मेडिकल कॉलेज के संचालक डॉ. अजय गोयनका, एलएन मेडिकल के जयनारायण चौकसे और डॉ. डीके सत्पथी की अग्रिम जमानत अर्जियों पर बुधवार को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। गोयनका की तरफ से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता केटीएस तुलसी ने दलील दी। कहा- बिना सबूत के उनके मुवक्किल को आरोपी बना दिया गया है। कोर्ट जमानत देता है तो गोयनका सीबीआई को पूरा सहयोग देने को तैयार हैं।
– इस पर चीफ जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस विजय कुमार शुक्ला की बेंच ने कहा कि आरोपी जांच में सहयोग देना चाहते हैं तो अब तक सरेंडर कर देना था। करीब दो घंटे चली सुनवाई के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया वहीं पीपुल्स यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ. विजय कुमार पंड्या, डॉ. विजय कुमार रमणानी और तत्कालीन एनएम श्रीवास्तव की अर्जियों पर बेंच ने सुनवाई 13 दिसंबर तक के लिए बढ़ा दी।

– इस तरह के बड़े घोटाले में कानून की यह जिम्मेदारी है कि हरेक आरोपी को जेल भेजा जाए ताकि समाज में अच्छा संदेश जाए। व्यापमं घोटाले की वजह से हजारों योग्य छात्र सीट पाने से वंचित रहे हैं। ऐसी स्थिति में अगर आरोपी प्रभावशाली है तो भी उसके प्रति उदारता नहीं दिखाई जा सकती।
आरोपी जमानत के हकदार नहीं: सीबीआई

– असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल जेके जैन ने अपना पक्ष रखते हुए युगलपीठ को बताया कि सभी आरोपियों पर बड़े गंभीर आरोप हैं। उन्होंने हजारों छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ किया है और मोटी रकम लेकर अपात्रों को मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश दे दिया है। ऐसे में आरोपियों की ओर से दायर अर्जियां खारिज की जाएं।

आरोपियों की तरफ से वरिष्ठ वकील केटीएस तुलसी प्रवीण पारेख, सिद्धार्थ राधेलाल गुप्ता अौर सुरेंद्र सिंह ने पक्ष रखा। हाईकोर्ट ने क्या कहा पढ़िए लाइव…

केटीएस तुलसी: किसी के खिलाफ पुख्ता सबूत पेश नहीं किए गए हैं। आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। जमानत मौलिक अधिकार है।
हाईकोर्ट: मौलिक अधिकार के आधार पर जमानत दी जाती है तो हत्या और ज्यादती जैसे मामलों में भी आरोपी जमानत का दावा करेंगे। क्या यह ठीक होगा?

पारेख: आवेदकों की समाज में प्रतिष्ठा है। यदि गिरफ्तारी हुई तो उनकी छवि खराब होगी।

हाईकोर्ट: व्यापमं घोटाले में हजारों छात्रों का भविष्य बर्बाद हुआ है। ऐसे प्रभावशाली लोगों को जमानत का लाभ मिला तो समाज में गलत संदेश जाएगा।
तुलसी और पारेख: जमानत के संबंध में सुप्रीम कोर्ट की कई नजीरें हैं। इन पर गौर करें।

हाईकोर्ट : जितनी भी नजीरें पेश की गईं, वे सुसाइडल हैं। उनका फायदा आरोपियों को नहीं दे सकते।